हरिद्वार में स्वच्छता व्यवस्था पर बड़ा सवाल: ट्रांसफर स्टेशन होने के बावजूद वार्ड-52 के पास क्यों डंप हो रहा कूड़ा? जिम्मेदार कौन?

हरिद्वार। एक ओर सरकार स्वच्छ भारत मिशन के तहत करोड़ों रुपये खर्च कर शहरों को स्वच्छ बनाने का दावा कर रही है, दूसरी ओर हरिद्वार में सामने आई तस्वीरें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। मामला हरिद्वार की विष्णु लोक कॉलोनी, वार्ड नंबर-52 का है, जहां विभिन्न वार्डों से लाया गया कूड़ा खुले स्थान पर डंप किए जाने का आरोप है।
सबसे विडंबना की बात यह है कि जिस स्थान के पास कूड़ा डाला जा रहा है, उसी दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है—”स्वच्छता ही सेवा है, गंदगी जानलेवा है।” सवाल यह है कि क्या यह संदेश केवल दीवारों तक सीमित है? यदि गंदगी वास्तव में जानलेवा है, तो फिर नगर निगम स्वयं ऐसी स्थिति बनने क्यों दे रहा है?
हरिद्वार नगर निगम के पास भगत सिंह चौक, बैरागी कैंप और लालजीवाला में लोकल ट्रांसफर स्टेशन उपलब्ध हैं। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि वार्ड नंबर-52 के समीप कूड़ा डंप करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या यह अधिकृत व्यवस्था है? यदि हाँ, तो उसका आदेश और अनुमति कहाँ है? और यदि नहीं, तो जिम्मेदार कौन है?
मामला यहीं नहीं रुकता। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाए हैं कि कूड़ा चुनने वाले लोगों से कथित रूप से पैसे लिए जाते हैं और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को नियमों के विपरीत बाहर निकलवाया जाता है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ा गंभीर विषय है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
इस पूरे मामले पर जब समाचार प्रहरी 24 ने नगर निगम के UNA अधिकारी दीपक गोस्वामी से बात की, तो उन्होंने कहा कि यह कूड़ा नगर निगम का नहीं बल्कि बीएचईएल का है। लेकिन यदि ऐसा है, तो मौके पर दिखाई दे रही स्थिति की जिम्मेदारी कौन लेगा? जनता स्पष्ट जवाब चाहती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामग्री पुनर्प्राप्ति एवं पृथक्करण केंद्र (एमआरएफ) को लेकर भी उठ रहे हैं। यदि कूड़े की वैज्ञानिक छंटाई और पुनर्चक्रण की व्यवस्था होनी चाहिए, तो वह प्रभावी रूप से क्यों दिखाई नहीं दे रही? क्या नियमों का पालन हो रहा है या नहीं? यदि हो रहा है, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
अब सवाल सीधे हरिद्वार नगर निगम, नगर आयुक्त और संबंधित अधिकारियों से हैं—
वार्ड-52 के पास कूड़ा डालने की अनुमति किसने दी?
ट्रांसफर स्टेशन होने के बावजूद यह व्यवस्था क्यों अपनाई गई?
एमआरएफ पूरी क्षमता से क्यों नहीं चल रहा?
स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच कब होगी?
यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता हुई है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
यह मामला केवल कूड़ा प्रबंधन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का है। जनता जानना चाहती है कि स्वच्छता अभियान के दावे ज़मीन पर क्यों नहीं दिख रहे।
समाचार प्रहरी 24 इस मुद्दे की लगातार पड़ताल करेगा, संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी प्रकाशित करेगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो इस पूरे मामले को शासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष भी उठाएगा।
अब निगाहें प्रशासन पर हैं—क्या सवालों का जवाब मिलेगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?

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