समाचार प्रहरी/ब्यूरो
हरिद्वार। दूसरों के घरों में रोशनी पहुंचाने वाले बिजली विभाग में तैनात प्राइवेट लाइनमैन आज खुद आर्थिक संकट के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। आरोप है कि इन लाइनमैनों को पिछले छह महीने से वेतन नहीं मिला है। लंबे समय से वेतन के इंतजार में बैठे कर्मचारियों और उनके परिवारों के सामने घर चलाने से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक का संकट खड़ा हो गया है।
प्राइवेट लाइनमैनों का काम कितना जोखिम भरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिजली का फॉल्ट होने पर ये कर्मचारी रात के 2 बजे तक, तेज बारिश, कड़ाके की धूप और विपरीत परिस्थितियों में भी मौके पर पहुंचते हैं। अपनी जान की परवाह किए बिना ऊंचे बिजली के खंभों पर चढ़कर लाइन ठीक करते हैं, ताकि लोगों के घरों और दुकानों में बिजली की आपूर्ति बहाल हो सके।
लेकिन विडंबना देखिए—जो दूसरों के घरों में उजाला कर रहे हैं, उनके अपने परिवार वेतन के इंतजार में परेशान हैं।
कर्मचारियों का आरोप है कि ठेकेदार द्वारा उन्हें लगातार आश्वासन दिया जा रहा है, लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया। कर्मचारियों के सामने बच्चों की स्कूल फीस, घर का किराया, राशन, दूध और रोजमर्रा के खर्चों का संकट खड़ा हो गया है। उनका कहना है कि वे अपनी सैलरी पर ही पूरी तरह निर्भर हैं और वेतन नहीं मिलने से परिवार का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है।
कैमरे के सामने ठेकेदार ने दिया आश्वासन
मामले को लेकर समाचार प्रहरी 24 ने जब संबंधित ठेकेदार से फोन पर बातचीत की तो ठेकेदार ने आश्वासन देते हुए कहा कि अगले मंगलवार तक कर्मचारियों की सैलरी उनके खातों में डाल दी जाएगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ठेकेदार अपने वादे पर कायम रहेगा और छह महीने से वेतन का इंतजार कर रहे इन कर्मचारियों को उनकी मेहनत की कमाई मिल पाएगी?
श्रम विभाग और विद्युत विभाग की भूमिका पर सवाल
छह महीने से वेतन नहीं मिलने के आरोपों ने श्रम विभाग और विद्युत विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर इतने लंबे समय तक कर्मचारियों का वेतन लंबित रहने की शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई? क्या संबंधित ठेकेदार से जवाब मांगा जाएगा? क्या श्रमिकों के बकाया वेतन का भुगतान सुनिश्चित कराया जाएगा?
अब सभी की नजर अगले मंगलवार पर टिकी है। ठेकेदार का आश्वासन पूरा होता है या फिर कर्मचारियों को एक बार फिर तारीख पर तारीख मिलती है—यह देखने वाली बात होगी।
क्योंकि सवाल सिर्फ छह महीने की सैलरी का नहीं, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का है, जिनकी उम्मीदें इन लाइनमैनों की मेहनत की कमाई से जुड़ी हैं।

