बिल्केश्वर रोड के पुराने इंडस्ट्रियल एरिया से सटे क्षेत्र में होटल, निजी संस्थानों और कंपनियों पर वन भूमि के उपयोग के आरोप, स्थानीय लोगों ने संयुक्त सर्वे और उच्च स्तरीय जांच की उठाई मांग।
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में राजाजी टाइगर रिजर्व की वन भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। बिल्केश्वर रोड स्थित पुराने इंडस्ट्रियल एरिया से सटे क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि वर्षों से कुछ होटल, निजी कंपनियां और शिक्षण संस्थान वन भूमि का उपयोग आवागमन के रास्ते के रूप में कर रहे हैं। गंभीर बात यह है कि कई बार शिकायतें किए जाने के बावजूद वन विभाग की ओर से अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई है, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

स्थानीय नागरिकों का दावा है कि संबंधित संस्थानों के राजस्व अभिलेखों और स्वीकृत नक्शों में प्रवेश मार्ग किसी अन्य स्थान से दर्शाया गया है, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अलग दिखाई देती है। आरोप है कि वन भूमि पर स्थायी रास्ता बनाकर उसका लगातार उपयोग किया जा रहा है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल वन भूमि पर अतिक्रमण का मामला होगा बल्कि वन संरक्षण से जुड़े नियमों का भी गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि इस संबंध में कई बार वन विभाग और संबंधित अधिकारियों को शिकायतें दी गईं, लेकिन मामला कार्रवाई के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित रह गया। हाल ही में हरिद्वार रेंज में नए वन अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा, लेकिन अब तक मौके पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होने से स्थानीय लोगों में निराशा और नाराजगी बढ़ती जा रही है।
वन एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजाजी टाइगर रिजर्व की भूमि पर अवैध कब्जा या अनधिकृत उपयोग हो रहा है, तो इसका सीधा प्रभाव वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। राजाजी टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण संरक्षित वन क्षेत्रों में शामिल है और यहां की भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण, अतिक्रमण या व्यावसायिक उपयोग भविष्य में पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि पूरे क्षेत्र का संयुक्त सर्वे वन विभाग, राजस्व विभाग और अन्य संबंधित विभागों की मौजूदगी में कराया जाए। साथ ही राजस्व अभिलेखों, वन भूमि के रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान कर यह स्पष्ट किया जाए कि कहीं वन भूमि पर अवैध कब्जा या उपयोग तो नहीं हो रहा है। यदि जांच में किसी होटल, कंपनी या शिक्षण संस्थान द्वारा वन भूमि पर अतिक्रमण की पुष्टि होती है तो नियमानुसार तत्काल कार्रवाई करते हुए भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए।
क्षेत्रवासियों ने यह भी मांग उठाई है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और यह भी तय किया जाए कि यदि वर्षों से वन भूमि पर कथित अतिक्रमण जारी था तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में वन क्षेत्र पर बढ़ता दबाव पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करेगा, या फिर शिकायतें पहले की तरह फाइलों में ही दबकर रह जाएंगी। स्थानीय नागरिकों की निगाहें अब विभागीय कार्रवाई और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

