वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों ने खोली साजिश की परतें, निर्दोषों को फंसाने की रची गई थी साजिश
चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले से सामने आया कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला अब पूरी तरह नया मोड़ ले चुका है। जिस घटना ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी और लोगों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया था, वही मामला अब पुलिस जांच में झूठा और मनगढ़ंत पाया गया है। पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने वैज्ञानिक, तकनीकी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर इस पूरे मामले का खुलासा करते हुए चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए रेखा यादव के निर्देश पर 10 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया था। टीम ने घटना से जुड़े हर पहलू की गहनता से जांच की। जांच के दौरान पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), डिजिटल डेटा और मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया। इन सभी तथ्यों ने कथित घटना की सच्चाई को पूरी तरह बदल कर रख दिया।
एसआईटी जांच में सामने आया कि कथित पीड़िता घटना के समय अपनी मर्जी से एक विवाह समारोह में शामिल होने गई थी। जांच टीम को मिले सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों में कहीं भी जबरदस्ती या किसी प्रकार की आपराधिक गतिविधि के संकेत नहीं मिले। वहीं चिकित्सीय परीक्षण में भी किसी संघर्ष, चोट या दुष्कर्म से जुड़े स्पष्ट निशान नहीं पाए गए, जिसके बाद पुलिस का शक गहरा गया।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरे मामले के पीछे एक सुनियोजित साजिश रची गई थी। जांच एजेंसियों के अनुसार इस षड्यंत्र का मुख्य आरोपी कमल रावत है, जिसने निजी दुश्मनी और बदले की भावना में नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर झूठी कहानी तैयार करने के लिए प्रेरित किया। पुलिस के अनुसार जिन तीन लोगों—विनोद सिंह रावत, नवीन सिंह रावत और पूरन सिंह रावत—को इस मामले में नामजद किया गया था, वे घटना स्थल पर मौजूद ही नहीं थे। तकनीकी साक्ष्यों ने उनकी मौजूदगी के दावों को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।
मामले के खुलासे के बाद उत्तराखंड पुलिस ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर उनकी नीति “जीरो टॉलरेंस” की है और किसी भी वास्तविक अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन साथ ही निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने और समाज में भ्रम फैलाने वालों के खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस अधीक्षक रेखा यादव ने जनता और मीडिया से अपील करते हुए कहा कि किसी भी संवेदनशील मामले में केवल सत्यापित तथ्यों पर ही भरोसा करें और अफवाहों से बचें। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी फैलाना कानूनन अपराध है और ऐसे लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल पुलिस द्वारा डिजिटल एवं फॉरेंसिक साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण जारी है। अधिकारियों का कहना है कि यदि अंतिम जांच में आरोप पूरी तरह झूठे और मनगढ़ंत साबित होते हैं, तो साजिश रचने वाले सभी लोगों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि झूठे आरोपों के जरिए किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कितनी गंभीर समस्या बनती जा रही है।

